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Tuesday, 21 March 2017

बस इतना सा ख्वाब है....



We all have certain dreams in our hearts for satisfying our thoughts and sometimes just to motivate oneself. Often, I think of people who doesn't have dreams and their daily life is much more sorted than others. But still many people dream, so do I, that too with a disengaged head and some realistic yet complicated imagination.

So, here's a poem on what all I mostly dream about and some unsorted strings of my philosophical facet. :)



एक अनसुनी कहानी सुनाना चाहता हूँ ...
तो कुछ कोरे पन्नो में शब्द बुनना चाहता हूँ ....
घड़ी के काँटों की आवाज़ बनना चाहता हूँ ....
तो कभी गुलाब जामुन की मिठास बनना चाहता हूँ ....


कभी ग़ालिब की ग़ज़ल का साज़ बनना चाहता हूँ ....
तो कभी चाँद की चाँदनी का मोहताज़ बनना चाहता हूँ ....
काली स्याही से इतिहास लिखना चाहता हूँ ...
तो कभी रंगमंच पे एक अनूठा किरदार निभाना चाहता हूँ ....


कभी सूरज की किरणों का तेज़ बनना चाहता हूँ ....
तो कभी माँ के प्यार का एहसास बनना चाहता हूँ ....
चाहने के मायने तो सब समझना चाहते हैं ....
और में उन मायनों का पर्याय बनना चाहता हूँ ....



Happy World Poetry Day to all the wonderful and creative poets! :)


Thursday, 3 November 2016

यात्री गण कृप्या ध्यान दीजिए ...



ये रेलगाड़ी की छुक-छुक करती आवाज़ ..
ये पटरियों की कपकपाहट का एहसास ...
ये स्लीपर की बोगी में सफर करता मैं आज  ..
ये जो 7 रूपए की चाय का लुत्फ उठाता पूरा समाज  ... 

ये थरथराती सी रेल का हमेशा सा मिज़ाज  ..
ये जो "यात्री गण कृप्या ध्यान दीजिए" बोलने का मधुर सा अंदाज  ...
कभी अंजानो से पॉलिटिक्स पे बहस करता मैं आज  ..
तो कभी क्रिकेट के विशेषज्ञ की भूमिका निभाता पूरा समाज  ... 

कभी समोसा खाता तो कभी चाय की चुस्की लगाता  ..
कभी ट्रेन में शॉपिंग करते दिखता  ...
तो कभी मोबाइल चार्ज करने की लाइन में लोगों से लड़ते दिखता  ..
ये सफर है बड़ा ही अनोखा जो करता हूँ मैं आज  ...
एक मुसाफिर में तनहा सा मंज़िल का इंतज़ार करता हूँ मैं आज  ...



I am a Blogbuddy with BlogChatter.


Wednesday, 28 September 2016

तेरे बचपन की यादें ...

Painting by - Ayushi Jain
 
मासूम सी ये उँगलियाँ ,
और ये नन्ही सी मुस्कान  ...
पलकों पे सजाए रखा है ,
सपनो का ये जहाँ  ...

कुछ नटखट सी अदाएँ ,
तो कुछ शरारत भरी आँखें  ...
हर गलती को छुपाती है ,
इसके मन की ये सब बातें  ...

रुई की गरम रज़ाई में ,
तो कभी माँ के आँचल में  ....
लोरी सुनके जो सोता है ,
ये अपने छोटे से महल में  ....

न कभी थकता है ,
न कभी रुकता है  ...
डांटों तो आंसू बहाता है ,
मेरे लाल तू मुझे बहुत सताता है  ....

बचपन की जो ये यादें तेरी ,
आज पिरोके रखी है ....
भूल जाए अगर तू मुझे ,
तो ये यादें संजोके रखी है ....
तो ये यादें संजोके रखी है ....



 
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Tuesday, 20 September 2016

मन का खेल..

Image of cards depicting मन का खेल


किसी को शौहरत चाहिए,
तो किसी को मोहब्बत ....
किसी को सुकून चाहिए ,
तो किसी को बरकत ....

है ये मन का खेल एक बड़ा ,
न जाने कितने सदियों से चलता आ रहा है ये सिलसिला ....

पहर दर पहर ,
किस्से बनते जा रहे हैं ....
कभी हम उनको ,
तो कभी वो हमको ,
ये बातें सुना रहे हैं ....

दिल की चाहत को समझो ,
तो एहसास होता है ....
ये मन का वहम है यारों ,
कभी दिल अपने पास ,
तो कभी उनके पास होता है ....

डरता तो खुदा भी है ,
अपने बन्दों की जरूरतों से ....
सुनने से मुकरता है ,
तो कभी हक़ीक़त बयाँ करने से कतराता है ....

है ये मन का खेल एक बड़ा ,
न जाने कितने सदियों से चलता आ रहा है ये सिलसिला .....





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Saturday, 10 September 2016

आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ...



There comes a time in everyone's life when a person feels sad before leaving his/her home. Separation is something that plays a hard part when you live far from home and visit on certain occasions, that too for short periods. I always feel that whether parents shows their emotions or not as they miss their children immensely when they live far from them. 

So here's a poem, I'm sharing with you all! The first two stanzas depicts the sad emotion and the last stanza depicts the joy (like a happy ending)!


आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ...
अपनों से दूर जाने की जो खबर ये लायी ,
आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ...
वक़्त के पन्ने कब पलटते गए ,
न खबर हमको कभी लग पायी ,
आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ...
ये जो गहरे रिश्तों को कभी न भूल पायी ,
आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ...

घर की रौनक को छोड़ चले जा रहे हैं हम सब ,
माता-पिता से दूरिया जो बढ़ा रहे हैं हम सब ,
ये बात किसी को न समझ आयी ,
आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ...
वो जो ममता के एहसास को भुलाते जा रहे हैं ,
वो जो अपनों के गमो को हम समझ न पा रहे हैं ,
ये खेल की बिसात में ,
जो जीवन की बाज़ी लगायी ,
आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ....

दिल की बात जो आज समझ आयी ,
अंधेरे में एक लौ जो तुमने जलायी ,
खुशी है की रात सुहानी आज नज़र आयी ,
आज फिर एक बार बिरहा की घड़ी आयी ...
नये किस्से जो ये साथ में लायी ,
नये वादे ये जो संग कर आयी ,
बिरहा होने का दर्द ये छोड़ आयी ,
आज फिर एक बार खुशी की लहर सी छायी ...
आज फिर एक बार खुशी की लहर सी छायी ...

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Tuesday, 9 August 2016

Fear of the unknown!


Fear of the unknown! | Kala Ghoda Festival, Mumbai, Maharashtra, India

The horrendous truth of the Dark India! We often hear stories of rape incidents, but what we not hear often is the stories of those victims who actually faces it. Fear of social anxiety and inner pain not only kills the person from inside but it also grows an insecurity of ending a life. Its hard to imagine that how the rape victims live their lives. But if we take a stand and help such people in building their confidence, then we can surely save some lives. There is nothing better than helping others in their difficult times. So, join your hands and save humanity!

Re-posting one of my old poems with this photo blog post.



कुछ कहती थी वो उन ओझल आँखों से ..
कुछ ख्वाब थे उसके हसीन ..
अरमान थे उसके कुछ बनने के ..
दुनिया थी उसकी बेहद रंगीन ..
छोटी सी भूल वो कर बैठी ..
निकल पड़ी अकेली तंग रस्तो पे ..
न वक़्त का पता था ..
न अनहोनी घटने का अंदाज़ा ..
प्यार से पली थी वो, मासूमियत थी उसकी निशानी ..
पर हैवानो के पिंजरे में फस गयी बिचारी वो अनजानी ..
घुट घुट के सहा उसने ..
हैवानियत का वो मंज़र ..
नादान सी थी हंसी उसकी ..
दूर हो गयी अब हर ख़ुशी उसकी ..
सोचा न था उसने जो हुआ ..
दरिन्दायी का आलम उसने जो सहा ..
कहते हुए भी डर लगता है ..
पर दिल्ही अब किसी के मन में नहीं बस्ता है .... 



 
This post has been written for #CreativeCurves under #BlogOEmotion week

Monday, 25 July 2016

छाओं है जो हम सबकी...


हवा में तैरती ,
कभी नदी के किनारे ,
तो कभी आसमान के तले  ... 
एक मासूम सी हंसी छुपाये ,
जो आगे बढ़ रही है ये हर गम को भुलाए  ... 
कभी बातें करने से डरती है ,
कभी लड़खड़ा के चलती है ,
तो कभी थर थराके फिसलती है  ... 
न जाने क्यों छुपना चाहती है ,
न जाने क्यों थक के रुक सी जाती है  ... 
सूरज से बचना चाहती है ,
तो कभी अंधेरे में भी डराती है  ... 
बिन कहे भी तू मुझको ,
एक आराम का एहसास दे जाती है  ... 
धूप लगे जो मुझको ,
जलने से मुझे बचाती है  ... 
शाम ढलते ही तू मुझसे ,
न जाने क्यों मोह छुड़ाती है ...
तू छाओं है जो हम सबकी ,
तो रूठ के क्यों चली जाती है  ... 
तू छाओं है जो हम सबकी ,
तो दोस्त बनाके क्यों रुलाती है  ... 




This post is written for the #HalfMarathon blogging challenge at #Blogchatter DailyChatter. Suggestions and feedback are most welcome.

Monday, 23 May 2016

Ek maa hi to hai...




हर साँस में जो बसती है ...
एक माँ ही तो है जो मेरे दिल की हर एक बात समझती है ...
अपने दर्द को भी जो भुला सकती है ...
एक माँ ही तो है जो मुझे प्यार से सुला सकती है...


अपनी खोयी मुस्कान भी जो छुपाए रखती है ...
एक माँ ही तो है जो मेरा मनोबल बनाए रखती है...
हर बात को जो बिना कहे समझ सकती है ...
एक माँ ही तो है जो मेरे दिल में बसती है...


चाहे दिन हो या हो रात ,
जो बस हर पल वो मेरा इंतज़ार करती है ...
एक माँ ही तो है जो मुझे दुलार करती है ...
एक माँ ही तो है जो मुझसे प्यार करती है .....


Tuesday, 5 April 2016

माँ के आँचल में ...



 तेरी यादों में जो तन्हा बैठा हूँ ,
तो लगता है जैसे कुछ कम सा है आज  ...
तेरे आंचल में जो छुपना चाहता हूँ ,
तो लगता है जैसे कुछ कम सा है आज  ...

हर घड़ी जो तेरे साये का इंतज़ार करता हूँ ,
तो लगता है जैसे कुछ कम सा है आज  ...
तेरे प्यार के एहसास को जो भूल रहा हूँ ,
तो लगता है जैसे कुछ कम सा है आज  ...

दिल की एक बात को बयां करना चाहता हूँ ,
तो लगता है जैसे कुछ कम सा है आज  ...
घर के हर कोने में तुझे खोजता हूँ ,
तो लगता है जैसे कुछ कम सा है आज  ...

हर शाम तेरी ही याद में समय थमता है ,
तो लगता है जैसे कुछ कम सा है आज  ...
अय माँ तेरे पास रहने का खयाल भी रहता है ,
तो लगता है जैसे एक मासूम सी छाओं में सिमटा हुआ रहता हूँ आज  ...
तेरे दुलार को अभी भी तरसता हूँ ,
तो लगता है जैसे दिल से अभी भी बच्चा हूँ मैँ आज ...



Sunday, 31 January 2016

क्या हर कहानी अधूरी होती है ??


हर कहानी अधूरी नहीं होती  .... 
कभी किस्सों से भरी होती है  ..... 
तो कभी कोरे कागज़ की तरह  .... 
पर फिर भी कुछ कहती है  ... 
जो शब्दों में बयां न होती है  .... 
कभी कुछ गहराइयों से भरी होती है  .... 
मगर सच कहे तो हर कहानी अधूरी नहीं होती है   ... 
कभी ख़ुशी के पल संजोके रखती है  .... 
तो कभी मन की बातें छुपाके रखती है  .... 
कहे जाने से न जाने क्यों कतराती है  .... 
अधूरी हो या न हो  ... 
पर फिर भी न जाने क्यों ये तन्हाई के समन्दर में बही जाती है  ....
बातें बहुत बनाती है  ... 
किस्से बहुत सुनाती है  ... 
पर सच कहे तो हर कहानी अपने अंदर एक ख़ामोशी को अपनाती है  ... 
अधूरी हो या न हो  ...
पर फिर भी ये कहानी सच्चाई का आइना दिखाती है  ....

Sunday, 8 November 2015

रात की चादर ओढ़े हुए …


रात की चादर ओढ़े हुए  … 
ये एक हवा ही तो है 
जो बहे जा रही है ,
इठला रही है , शर्मा रही है  .... 
पर फिर भी सन्नाटे में ,
एक संदल सा एहसास पहुंचा रही है  .... 
पहर दर पहर जो इसने है सीखा मुह मोड़ना ,
शाम के सहर में भी अपनों का साथ छोड़ना  … 
कभी बिना कहे ओझल होना  ,
तो कभी  कहीं एक सर्दी का एहसास दिलाना  … 
हर मौसम में एक अनोखा सा रूप दिखा रही है ,
तो कभी चुप चुपके सबको सता रही है  … 
रात की चादर ओढ़े हुए  …
एक हवा ही तो है
जो बहे जा रही है , इठला रही है 
शर्मा रही है  ....

Wednesday, 10 June 2015

Kya kare kya na kare...



काश के ये प्यार जैसी चीज़ न होती  .... 
न सपने होते ,
न हम दीवाने होते  ....
 न इश्क़ के बहाने होते ,
न झूठे-सच्चे अफ़साने होते ....
न देर रातें बातें होती ,
न अनगिनत मुलाकातें होती ....
  न शामें सुहानी लगती ,
न सुबह बेगानी लगती ....
न कहानियां बनती ,
न कोई कलाकार बनता ....
 न दिल को अफ़सोस होता ,
न प्यार में कोई सोज़ होता ....
काश के बस एक एहसास होता ,
और ये नादान दिल भी अपने पास होता .......




Thursday, 30 April 2015

Udaan !

 एक परिंदा आज़ादी की तलाश में 
कभी गिरते कभी संभलते 
कभी पिंजरे से निकलने के प्रयास में 
मेहनत के रंग दिखलाता है
उड़ना चाहता है वो खुले आसमान के तले 
पर फिर भी उड़ान से घबराता है 
पँख समेटके कभी निराशा से उसका मन भर जाता है 
पर फिर भी कोशिशों से फिर वो साहस दिखलाता है 
डरता है की न खो दे वो ये ज़िन्दगी 
पर फिर भी अपने दिल को समझाता है 
हार के पथ पे चलने से 
वो हमेशा जी छुड़ाता है 
आज़ादी की राह में बस 
अपने मन को ढांढस बंधवाता है 
और कोशिशों के पथ पर 
जीत का बिगुल बजाता है 
बस उड़ने की चाह को लिए 
अपना सपना सच कराता है 
खुले आसमान के तले 
      बस उड़ा चला जाता है …
       बस उड़ा चला जाता है …

Saturday, 18 April 2015

सपनो का जहाँ !


काश के एक ऐसा आशियां होता ....
समन्दर की सहमी हंसी होती ....
 और सितारों के दरमियाँ आसमान होता .... 
काश के हर दिन खुशनुमा होता ....
चिड़ियों की चहचहाती आवाज़ होती....
और गुस्ताखियों में भी चंचलता तलाश होती....
काश के शाम  ढलते -ढलते बरसात होती .... 
मिट्टी की सौंधी खुशबू होती.... 
और मौसम की नटखट सादगी होती....
काश के सपने सच होते....
दिन ढलता और कहीं खो जाते हम....
रात के सन्नाटे में....
फिर सोते और सपने सजाते हम ....

Tuesday, 18 November 2014

तन्हाई की चादर...

 
तन्हाई की चादर लपेटे हुए ,
अकेले-अकेले से  क्यों लग रहे हो आज  .... 
सर्द हवाओं से डरते थे  तुम कभी ,
आज उसी फ़िज़ा में घुम हो तुम कहीं  .... 
क्या है इस मन की उलझन  ,
जो नम आँखों में दिख रही है  … 
सहर होने को है ,
पर फिर भी अँधेरा क्यों है आज  … 
जाने किस गली को जा रहे हो ,
आज तुम बहुत बेबस नज़र आ रहे हो  …
आज तुम बहुत बेबस नज़र आ रहे हो  …

Tuesday, 28 October 2014

Dhua-dhua sa ye jahan !


धुँआ-धुँआ है ये समां  … 
धुँआ-धुँआ है हर ज़र्रा  .... 
आज इस धुएँ में हमको जी लेने दे … 
गमो के ज़हर को आज पी लेने दे  .... 
कहता तो है ये दिल भी बहुत ,
दूर तलक जाने के लिए  … 
ज़िक्र करने से न बहल पाएगा  … 
ये ज़ालिम दिल न समझ पाएगा  … 
ओढ़ी हुई रज़ाई में ,
ये बचपन भी सिमट सा जाएगा  .... 
ये धुँआ तो है बनावटी 
बातों-बातों में खत्म हो जाएगा  .... 
गुमसुम न रह जाना तुम कहीं  .... 
क्यूँकि ये किस्सा दूर तलक जाएगा  …

Tuesday, 7 October 2014

DiL ChAhTa HaI !



तेरी इन आँखों में डूबने को दिल चाहता है  ....
वक़्त न निकल जाए ,
इस समुन्दर में बहने को दिल चाहता है  …
रूह से निकली आवाज़ की सुने तो ,
ख्वाबों को जीने का दिल चाहता है  .... 
कमज़ोरी को गले लगाये तो ,
शोरगुल में भी सन्नाटा सा छा जाता है   …
अजब सा जूनून है इस तनहा मन में ,
अजब सा है ये एहसास   ....
उलझन में फसा हुआ हूँ में एक मुसाफिर  ....
कोई राह दिखाए तो ,
प्यार करने को भी दिल चाहता है   …

Thursday, 3 July 2014

Tanha dil..!



गमो को छोड़ बहुत दूर जा रहा हूँ ,
वक़्त को छोड़ बहुत दूर जा रहा हूँ  ..
इस मासूम से पल में न जाने किस से घबरा रहा हूँ  ,
दर-दर भटक के न जाने किस को समझा रहा हूँ  ..
तन्हाई से डरता था में कभी ,
कभी खुदसे घबराता था  …
बारिश में भीगते-भीगते ,
बस अकेला चलता जाता था  … 
वक़्त ने ऐसी करवट ली ,
न जाने कितने गम दे गयी  …  
एक आस थी मन में जो बसी ,
बिखर गयी दिल की हर ख़ुशी  … 
रात हो या दिन , बस एक ख्याल आता है, 
सपनो में ऐ दोस्त सचाई से रूबरू क्यों नही कराता है  .... 

Thursday, 10 April 2014

आँखों की मासूमियत...



आंसू बनके जो गिरे थे वो मोती ,
आँखों की मासूमियत से थे वो परे... 
शिकायतें बहुत थी मगर ,
अपने गमो से हम थे डरे.... 
काश की ऐसा होता,
और खो जाते हम सपनो में.… 
सुकून से हंस लेते हम ,
दो पल के लिए ही सही.… 
बैरी तो बनना ही था,
अँधेरा तो छाना ही था… 
रात के सन्नाटे में,
डर के ऊपर काबू पाना ही था.… 
उम्मीद के चादर ओढ़े हुए
बस एक सपना सजाना था.… 
खुशियों से भरी ओझल आँखों में,
बस मासूमियत को बयां कराना था.…

Friday, 13 September 2013

मन का शैतान !!



अब तन्हाई सी छाई है  … 
न जाने अब कौनसी घडी आई है  ... 
सोते है न जागते हैं  … 
वक़्त के पीछे सब भगते हैं  … 
अकेले चलने से मंजिल मिलती नहीं  … 
साथ होने से तन्हाई ढलती नहीं  … 
न जाने मन क्यूँ परेशान है  … 
न जाने क्यूँ ये इतना हैरान है  … 
सब दिमाग  का खेल है लगता है  … 
फिर भी दिल पे जोर कहाँ है  … 
नसीब का खेल ये बड़ा है  … 
न जाने ये सामने कौनसा अनजान रास्ता पड़ा है  … 
अब हलके से शोर से भी डर लगता है  … 
न जाने कौनसा शैतान मन में बस्ता है  … 
न जाने कौनसा शैतान मन में बस्ता है   ….