
ये रेलगाड़ी की छुक-छुक करती आवाज़ ..
ये पटरियों की कपकपाहट का एहसास ...
ये स्लीपर की बोगी में सफर करता मैं आज ..
ये जो 7 रूपए की चाय का लुत्फ उठाता पूरा समाज ...
ये थरथराती सी रेल का हमेशा सा मिज़ाज ..
ये जो "यात्री गण कृप्या ध्यान दीजिए" बोलने का मधुर सा अंदाज ...
कभी अंजानो से पॉलिटिक्स पे बहस करता मैं आज ..
तो कभी क्रिकेट के विशेषज्ञ की भूमिका निभाता पूरा समाज ...
कभी समोसा खाता तो कभी चाय की चुस्की लगाता ..
कभी ट्रेन में शॉपिंग करते दिखता ...
तो कभी मोबाइल चार्ज करने की लाइन में लोगों से लड़ते दिखता ..
ये सफर है बड़ा ही अनोखा जो करता हूँ मैं आज ...
एक मुसाफिर में तनहा सा मंज़िल का इंतज़ार करता हूँ मैं आज ...
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