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Wednesday, 28 September 2016

तेरे बचपन की यादें ...

Painting by - Ayushi Jain
 
मासूम सी ये उँगलियाँ ,
और ये नन्ही सी मुस्कान  ...
पलकों पे सजाए रखा है ,
सपनो का ये जहाँ  ...

कुछ नटखट सी अदाएँ ,
तो कुछ शरारत भरी आँखें  ...
हर गलती को छुपाती है ,
इसके मन की ये सब बातें  ...

रुई की गरम रज़ाई में ,
तो कभी माँ के आँचल में  ....
लोरी सुनके जो सोता है ,
ये अपने छोटे से महल में  ....

न कभी थकता है ,
न कभी रुकता है  ...
डांटों तो आंसू बहाता है ,
मेरे लाल तू मुझे बहुत सताता है  ....

बचपन की जो ये यादें तेरी ,
आज पिरोके रखी है ....
भूल जाए अगर तू मुझे ,
तो ये यादें संजोके रखी है ....
तो ये यादें संजोके रखी है ....



 
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Friday, 15 July 2016

Will terrorism ever end?





There is a lot going on these days to unsettle our beautiful world. Terrorism is rapidly growing and destroying the very core of every single country. But its the humanity which is suffering the most. Hope these scenes of heinous crimes comes to an end soon and we all can live our life happily ever after.

A short poem on the reality of life against terrorism:


कुछ दर्द का एहसास करते हैं ,
तो कुछ दर्द दिया करते हैं ...
इंसानियत का कौनसा रूप है ये ,
जो वक्त को बदल रहा है ...
कभी मासूमियत का गला घोंट रहा है ,
तो कभी मासूमो का ...
न दिन में सुकून है अब ,
न रात का ठिकाना ...
कुछ दरिंदो का डर है ,
तो कुछ इंसानियत के मसीहा बनने वालों का ...
अनहोनियों के नाम पे ,
जो ये आतंक का साथ दिया करते हैं ...
ये इंसान तो हैं मगर ,
इंसानियत का लहू पीया करते हैं ...
काश ये समझ सकते ,
मानवता का पर्याय ...
और स्थापित कर सकते ,
एक नए कल का अध्याय ...
और स्थापित कर सकते ,
एक नए कल का अध्याय ...
 


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