Tuesday, 18 November 2014

तन्हाई की चादर...

 
तन्हाई की चादर लपेटे हुए ,
अकेले-अकेले से  क्यों लग रहे हो आज  .... 
सर्द हवाओं से डरते थे  तुम कभी ,
आज उसी फ़िज़ा में घुम हो तुम कहीं  .... 
क्या है इस मन की उलझन  ,
जो नम आँखों में दिख रही है  … 
सहर होने को है ,
पर फिर भी अँधेरा क्यों है आज  … 
जाने किस गली को जा रहे हो ,
आज तुम बहुत बेबस नज़र आ रहे हो  …
आज तुम बहुत बेबस नज़र आ रहे हो  …

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