Tuesday, 28 October 2014

Dhua-dhua sa ye jahan !


धुँआ-धुँआ है ये समां  … 
धुँआ-धुँआ है हर ज़र्रा  .... 
आज इस धुएँ में हमको जी लेने दे … 
गमो के ज़हर को आज पी लेने दे  .... 
कहता तो है ये दिल भी बहुत ,
दूर तलक जाने के लिए  … 
ज़िक्र करने से न बहल पाएगा  … 
ये ज़ालिम दिल न समझ पाएगा  … 
ओढ़ी हुई रज़ाई में ,
ये बचपन भी सिमट सा जाएगा  .... 
ये धुँआ तो है बनावटी 
बातों-बातों में खत्म हो जाएगा  .... 
गुमसुम न रह जाना तुम कहीं  .... 
क्यूँकि ये किस्सा दूर तलक जाएगा  …

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